Sunday, April 4

दिन पुराने..

I finished reading MIHYAP today. Shri greatbong ne badi achchi kitaab likhi hai. The DD generation kids are going to like it for sure. Now when i look back, the trasition appears so clear, from the almost restrictied economy and one channel days to the sudden changes in 92-93, with economic liberalization and with that the deluge of new avenues opening to the Indian youth.
The scenario then chnaged very fast..and suddenly our good old Doordarshan also became a thing of past.....the book touches some sublte and some prominent facets of those times....the times of much limited opportunities, resources and of course entertainment..:)

किताब पढके कुछ अपने बचपन के दूरदर्शन दिन याद आ गए....:D

१. वो दूरदर्शन के दिन भी क्या ही दिन थे....:)......१ दम unique experience, मुझे याद है अक्सर टीवी देखते समय कभी कभी स्क्रीन धुंधली होने लगती थी, या मच्छर types आने लगते थे....तो दिमाग में पहली बत्ती जलती थी, की ज़रूर antennae में कुछ गड़बड़ होगी तो दौड़ के हम तीनों (भाई बहनों) में से कोई छत पे जाता था, और वहीँ पर रखे १ लम्बे बांस से antennae को ठीक करने (घुमाने/ मारने) की कोशिश करने लगता "ठीक हुआ"..."अब ठीक है"...."और घुमाओ"...."मनु, जैसे कल किया था वैसे ही करो"...जैसे कई निर्देशों के आदान प्रदान के बाद.....अमूमन २-१५ मिनट की कोशिश के बाद अक्सर टीवी महाराज ठीक हो ही जाया करते थे.....ये सिलसिला शायद ९५ में बंद हुआ होगा, जब घर में cable लग गया ..:)

२. Bollywood के फैन तो हम बचपन से ही थे, उस समय नयी फिल्मों के गानों की १ झलक देखने के लिए, Wed या Friday को चित्रहार का इंतज़ार करना पड़ता था उसमे भी कोई gaurantee नहीं की भाई latest गाने आ ही जायेंगे तो, अखबार के "आज के कार्यक्रम" हिस्से में पढ़ के पता चला, की DD 2, यानी DD Metro नाम का १ DD1 का भाई चैनल है, जिसपे Sat या Sun को रात को कोई Superhit Muqabla नाम का show आता है , जिसमे कि सप्ताह के सबसे popular गाने दिखाए जाते हैं Baba the Great Sehgal ने इसका title song गाया था..:). अब DD2 तो हमारे यहाँ आता नहीं था, वो तो सिर्फ metros में आता था....तो क्या किया जाए, हमें कहीं से पता चला..कि दिल्ली के आस पास वाले शहरों में metro आता है...हमारा शहर दिल्ली से ठीक 299 km दूर है..:)..और आप कितनी भी कोशिश कर लें channels बदल बदल के TV पे ज़ुल्म ढाने की, आप "superhit" तो क्या, कोई flop मुकाबला भी नहीं देख पाएंगे, पर जैसा की मैंने जीवन के कुछ ३०-..:D सावन/ भादों/बसंत/ बहार के बाद जाना है, की मैं बचपन से ही बड़ी जुझारू प्रकृति की हूँ....ऐसे ही सुनी सुनाई बातों पे विश्वास करना...वो भी उन अनमोल गानों के लिए.....मुझे बिलकुल भी मंज़ूर नहीं था........तो बस फिर शुरू हुआ channels adjust करने का सिलसिला, anteannae कि दिशा बदलने का कार्यक्रम, और भी न जाने क्या क्या....बहुत कोशिशों बाद किसी १ channel पे metro आता महसूस सा हुआ....बस इतना..की आप पता ही कर पाए..की ये DD1 के अलावा कोई और चैनल है.....यानी मेट्रो है...:)..:)..:)...पर....."Sehgal" जी की सुरीली आवाज़ में शुरू होने वाला वो मुकाबला हम और हमारे जैसे कई फिल्मों के दीवानों की किस्मत में नहीं था....बहुत कोशिशों के बावजूद ये पाया गया..की "reception" बहुत ही खराब है...और अगर इसी तरह इस TV के कान खींचते/ मरोड़ते रहे तो कुछ और हो न हो..पिताजी अपनी इस मेहनत की कमाई से ऐसा दुराचार कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे, और किसी दिन हमारे ही कान खींचे हुए पाए जायेंगे...तो हम..यानी की मैं और मेरी प्रिय सहेली अरुणा, जो की इस और इस जैसे कई और सर्कसों में मेरी साथी हुआ करती थी.... ने अंततः हार मान ली..और वापस रुख किया..रंगोली और चित्रहार की ओर.:)

DD से जुडी बड़ी सारी बातें हैं जो याद हैं, और किताब में बड़े ही रोचक तरीके से ८० और ९० के दशक में सर्वव्यापी prcatices का विवरण किया है...:)...फिर वो चाहे दूरदर्शन हो, या advent of internet या बॉलीवुड का असर.....Greatbong ने लोहा और गुंडा फिमों का भी अनोखा विवरण किया है..:)...दोनों ही फिल्मों पर इतनी गूढ़ दृष्टि डालने के लिए उनका बहुत बहुत शुक्रिया...:)
खैर, दूरदर्शन पे १ चिटठा कुछ भी नहीं है...:).....

बहुत देर से youtube से कुछ पुराने अच्छे धारावाहिकों के title songs download करने की कोशिश कर रही हूँ ताकि वो यहाँ चेपे जा सकें और माहौल को और रूचिपूर्ण किया जा सके, पर लगातार असफलता ही हाथ लग रही है, १२:०० से ऊपर समय हो चूका है, और ये पोस्ट कल पर टालने का मन नहीं है......तो मैं ऐसे ही याद कर लेती हूँ DD 1 के कुछ पुराने serials जो मुझे विशेष प्रिय थे..:)
सुरभि.....और उसका वो "प्रभादेवी, मुंबई" वाला address...:)
दाने अनार के....एवं मुंगेरी लाल के हसीन सपने...दोनों में ही रघुवीर यादव थे....पता चला है की आजकल वो missing हैं..:O
कशिश- मालविका तिवारी और सुदेश बेरी के amazing romance की कहानी..:)
तस्वीर- ये Sun को ११ बजे के आसपास आया करता था, बड़ी मुश्किल से इसे देखने की इजाज़त मिली थी, शायद exams से कुछ दिन पहले ही शुरू हुआ था.
.तलाश- किसी उपन्यास पर आधारित, विजयेन्द्र घाटके और नीलिमा अज़ीम (अपने शहीद कपूर की मम्मी..:)) और इसका title song पुरानी फिल्म तलाश से ही था...
होनी अनहोनी- ये Thursday को आता था...अजीब पर अच्छा
Stone Boy- aha....a story about the kids of an Indian family in Mauritius, the young boy meets a stone boy (who was once a stone or something)...and the adventures that follow....i wish i could get this series from somewhere..btw the kid who played the stone boy -Ankur Jhaveri also played Arjun jr in Mahabharat,...
Flop Show,..he he..naam hi kaafi hai..:D
नीम का पेड़, हम लोग, किले का रहस्य.. रंगोली.. the Sat/ Sun movies..... one post as i said is nothing to revisit the DD memory lane...:)

8 people have something to say...:

Aaditya.khare said...

very true...still miss the old doordarshan dayz.....i am of the the same school of thought...the old dayz wer the best...to remind you a few more ....

Ek kahani...
dekho magar pyar se...
ados pados..
mr and mrs
street hawk
giant robot...

:)

डॉ .अनुराग said...

ओर स्टार ट्रेक ,ओल्ड फोक्स,.....सन्डे को पांच बजे स्पाइडर मेन....चाणक्य ,भारत एक खोज....हम लोग ,बुनियाद , मुंगेरीलाल के हसीं सपने ..............ओर दूरदर्शन का फेमस रूकावट के लिए खेद है ........

anuja said...

di u remember so much ..nd write so well..i never knew tht ur this talented

Deepti said...

@adi..he he..:)...

@Dr Anurag ji aapka blog padha, atyant hi sunder blog hai....:))...hum regular visitors ban gayen hain aapke blog ke...:)

@ani chalo samay rehte tujhe pata chal gaya...:D

Neeraj Rohilla said...

भईया प्लीज:
जुनून आने वाला है, प्लीज एंटीना सही कर दो।
नहीं, मुझे नहीं देखना...तुम खुद सही कर लो,
नहीं ऊपर छत पर बन्दर भी हैं, तुम साथ में चलो...

कहा न मुझे नहीं देखना...
मम्मी देखो ये एंटीना सही नहीं कर रहा है।
तुम लोगों का महाभारत तुम निपटो, मैं चाय बनाने जा रही हूँ।

अब जुनून तो हमें भी देखना था, बस थोडा भोकाल टाईट करना था। अच्छा एक शर्त पर, क्या? तुम्हारे पास जो नया वाला पेन है वो मुझे २ दिन के लिये दो। नहीं, तुम उसे खो दोगे। तो फ़िर जाओ, खुद सही कर लो एंटीना...
अच्छा, दो नहीं एक दिन के लिये...चलो ठीक है...

पेंचकस और प्लास/पिलास (तब प्लायर को प्लास ही कहते थे) निकालो, मैं बन्दरों के लिये डंडा लेकर चलता हूँ। फ़िर बडे प्यार से दोनो भाई बहन छत पर एंटीना सुधारते थे । नीचे मम्मी से टीवी की लाईव रिपोर्टिंग होती थी कि पिक्चर ठीक हुयी की नहीं।

उसके बाद चलते चलते:
दीदी, कोमल से तुम्हारी लडाई हुयी थी न, कहो तो उसके एंटीने का तार...फ़िर वो अपने आप तुम्हारे पास आयेगी जुनून देखने...

दीदी: (पैसिव एग्रेसिव खेलती हुयी) मुझे नहीं पता, तुम उल्टे सीधे काम बहुत करते हो। मतलब की तार सैबोटाज कर दिया जाये...

हा, हा, हा...

कोमल: नीरज, नीरज...भईया भईया...देखो एकदम से हमारा टीवी ठीक से नहीं आ रहा है, प्लीज हमारा एंटीना देख दो...

एंड द सर्किल कन्टिन्यूज....

poonam said...

arey achi baat tum jungle book kaise likhna bhool gyi......wo bhi to hmare kuch fav serials mein ata tha sun ko subah....jb kbhi hmare ghar ka mahual garam hota tha to hum bhai behen tumhare ghar bhane se aake use dekhte the....ya to ye keh kr ki aunty mummmy ne khatta mangaya hai ya fir anuja wo maths ki copy dede.....

Priyanka said...

hey deepti...
u really write so well...n ur blog really reminded me of those DD days...they were fun...i liked the serials palash k phool n imtihaan..those were really gud days!!!

Deepti said...

@neeraj sir..he he sahi likha hai..:)

@poonam: ab un dino ki kahaniyon pe to buk chap sakti hai...

@ priyanka: thanks ya...nice to know that you liked it....:)