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Friday, September 3

अ ब्लॉग पोस्ट -६

कुछ दिन पहले पति के साथ कुछ बात हो रही थी..और बातों बातों में इंजीनियरिंग के दिनों के viva का ज़िक्र आ गया.....इंजीनियरिंग कॉलेज में किये गए फर्जी कामों की लिस्ट में सेमेस्टर एंड में होने वाले vivas की १ अलग ही जगह है......पूरे सेमेस्टर labs में रोज़ अलग अलग लीलाएं होतीं थीं....और उनकी इतिश्री होती थी सेम एंड viva voce में.......हमारे 3rd सेमेस्टर में almost सभी subjects इलेक्ट्रोनिक्स/ इलेक्ट्रिकल के थे...और हमारे कॉलेज की इलेक्ट्रोनिक्स की faculty इस दुनिया के सबसे sadist लोगों को मिला के बनायीं गयी thi...१ से बढ़ कर १.....उनका जीवन में बस १ ही मकसद था...विद्यार्थियों की वाट लगा के रखना...हर दिन...हर क्लास में..हर viva में...और ofcourse ..हर exam में.....प्रक्टिकल क्लास्सेस में अक्सर इनका झुण्ड १ ही lab में आ जाता था....और हर हफ्ते किसी नयी तरह से हमारे तीन घन्टे बर्बाद किये जाते थे...खैर....उन labs में क्या नाटक होते थे..ये कभी और.....अभी ज़िक्र रहेगा इलेक्ट्रिकल measurements एंड measuring इंस्ट्रुमेंट्स....(EMMI) के प्रक्टिकल एक्साम का...theory एक्साम्स ख़तम होने के बाद practicals हुए...generally प्रक्टिकल एक्साम वाले दिन ही उसका viva भी हो जाया करता था....अगर external examiner न हुआ..तो उसके अगले दिन....पर उस बार...examiner की availaability थोड़ी मुश्किल हो गयी...EMMI और Network Analysis एंड Synthesis दो subjects के practicals हो गए और ये बताया गया की दोनों के ही viva २-३ दिन बाद होंगे.........एक्साम्स क्यूंकि ख़त्म हो चुके थे...और viva को हमने कभी इतना important समझा ही नहीं की उसकी चिंता की जाए...तो सभी लोग एक्साम्स ख़तम होने की ख़ुशी मानाने लगे.....हमारा सालाना जलसा.."उत्सव" भी आने वाला था..तो काफी जनता उसकी तैय्यारी में जुट गयी...प्रक्टिकल एक्साम के लगभग ३ दिन बाद खबर आई की भाई आज...EMMI का viva है...viva १ फोर्मलिटी भर हुआ करती थी ५० numbers का हिसाब देने की university को...तो १ साथ ५ छात्रों को कमरे में बुला लिया जाता था....और १५-२० मिनट तक छात्रों का ragging session चलता था...जिसमे external examiner समोसे और चाय पे ध्यान केन्द्रित रखता था.....और हमारी faculty अपने जन्म भर के frustrations का बेपरवाह छात्रों से बदला ले रही होती थी.....खैर.....रोल नंबर के हिसाब से ५-५ करके जनता अंदर जा रही थी......१ झुण्ड के बाहर आते ही सब उनपे लपक लेते थे..की भाई बताओ जो १- आध सवाल दागे गए हों अंदर syllabus से...उन्ही के answers रट लिए जाएँ.....examiner घर से कोई ८-10 सवालों की पोटली लाता था..और सभी १२-१५ batches से वही सवाल पूछे जाते थे.....
खैर इसी सरपट बाजी में...१ batch गया अंदर.....अंदर गए ५ लोगों में हमारे १ मित्र थे..श्री अनुपम जैन....जो की batch के कुछ .हंसमुख...easygoing ..लोगों में से थे...इनके चेहरे पे टेंशन शायद ही ४ साल में किसी ने देखी होगी...ये localite थे...और अपनी शान की सवारी..हीरो puch पे कॉलेज आया करते थे....3rd सेमेस्टर तक इनसे कोई विशेष दोस्ती तो नहीं हुई थी...पर इनके टेंशन फ्री attitude को जनता ने जान लिया था...खैर......पाँचों जन ने examiner और internal faculty के सामने अपनी अपनी सीटें ले लीं...और pseudo राग्गिंग चालू हो गयी....batch में १ और सज्जन गए थे ..जो की क्लास के सबसे हुर्ष्टपुष्ट और विशाल जीवों में से थे...पर स्वभाव से काफी गंभीर थे...उनसे examiner ने १ सवाल पूछा...जिसका उत्तर देने के लिए उन्होंने सोचना शुरू किया....(या शायद सोचने का नाटक शुरू किया)......खैर ...जब वहां से कोई उत्तर नहीं आया तो ..सवाल अगले छात्र पर carry फॉरवर्ड कर दिया गया.....सवाल टालने का ऐसा ही सिलसिला चल रहा था कि जैन साहब को अचानक हंसी आ गयी.....आपको सवाल का जवाब न आये..कोई बात नहीं....आप गर्दन झुका के बैठे रहे..कोई बात नहीं...पर अगर viva के उस concentration कैंप में.. आप हंस गए...किसी हंसी की बात पर भी...तो समझ लीजिये की आज आपका बड़ा दिन है.....जैन साहब को हँसता हुआ देख कर दोनों नरभक्षी जीवों ने उनकी ओर रुख किया...और उनसे जवाबदारी शुरू कर दी...उनकी हंसी पर २-४ लानतें फेंक कर ...उनसे कहा गया कि आप बताइये जवाब क्या होगा...... .अब सवाल जैन साहब के पाले में था...कहने की ज़रुरत नहीं है..उत्तर का तनिक भी आईडिया उन्हें नहीं था...और जितना उन्हें जाना है इतने समय में..उन्होंने शायद सवाल भी नहीं सुना था जब वो पहली बार उनके संगी से पुछा गया था.....जब जैन साहब के मुख से उत्तर का अवतरण नहीं हुआ तो ये तय हो गया कि आज की limelight के हकदार श्री जैन ही हैं....:) बाकी जनता राहत कि सांस ले रही थी कि अब बचे हुए समय में गुरु जन इन्ही की लंका लगायेंगे.....
जैन साहब को १ और मौका देते हुए एक्सामिनेर ने पूछा....कि चलिए कोई बात नहीं... आप ये ही बता दीजिये कि आपने प्रक्टिकल में कौन सा एक्सपेरिमेंट किया था...:)..ठंडी सांस लेते हुए...हमारे प्रिय मित्र ने अपने दिमाग पे जोर डाला...बहुत डाला....पर एक्साम्स ख़तम होने कि ख़ुशी शायद कुछ ज्यादा ही मन चुकी थी...दिमाग ने respond करने से मना कर दिया....और थोडा सकपकाते हुए अनुपम महाराज ने कहा.."सर वो तो अब याद नहीं.."...:D ......माहौल अब गरमा चुका था....दोनों गुरुजन स्तिथि का लुत्फ़ लेने के पूरे मूड में आ चुके थे.... इतने "कूल" छात्रों से सामना रोज़ रोज़ कहाँ हुआ करता है....मस्त हैं अपनी ही दुनिया में....खैर....एक्सामिनेर साहब का दिल थोडा पसीजा और उन्होंने सवाल को थोडा और आसान बनाते हुए और प्रक्टिकल में पूछे जाने वाले सवालों को १ अलग ही ऊँचाई पे ले जाते हुए पूछा....भाई..अच्छा आप ये ही बता दीजिये की आप कौनसे subject का viva देने आये हैं??.....:D ...अब भला ये भी कोई सवाल हुआ....माना प्रक्टिकल किये हुए ज्यादा दिन हो जाने के कारण हमें एक्सपेरिमेंट का नाम न याद हो....पर ये तो पता ही है की प्रक्टिकल किस subject का दिया था.....जैन साहब ने poore आत्मविश्वास के साथ इस सवाल को लपकते हुए झट से जवाब दिया....सर.... नेटवर्क सिंथेसिस एंड analysis ...:O .....इतना सुनना था कि सवाल पूछने वाले विद्वानों ने हार मान ली...और बाइज्ज़त श्री अनुपम जैन और बाकी छात्रों के झुण्ड को बाहर भेज दिया....:)...आज का उनका entertainment dose ज़रुरत से ज्यादा हो चुका था.....इतने की उन्हें आदत नहीं थी....:P ..

खैर..हमारे परम मित्र श्री अनुपम जैन प्रक्टिकल के उन बेमतलब क्लास्सेस से अब तक जीवन के कई milestones पार कर चुके हैं.....पिछले महीने की २१ तारिक को वे १ बेटे के पिता बने...:)...जीवन के इस सर्व्शेष्ठ्र achievement पर उन्हें बहुत बहुत बधाइयाँ....:)...
आज के Friday मूड के लिए ये गाना....


Wednesday, September 1

A ब्लॉग पोस्ट -५




शुक्र है शुक्रवार है.....बड़े दिनों बाद आज Fri को relax सा फील हो रहा है....कल राहत फ़तेह अली खान का concert देखने जाना है.....:)...ऐसे अच्छे दिन आते रहें समय समय पर...और मन लगा रहे....:) आज बड़े दिनों बाद ऑफिस से वापस आके चाट खाई..:); किसी ठेले पर तो नहीं, १ काफी ठीक ठाक सी दुकान पर....ठेले पर खाने का मज़ा कुछ और ही होता है वैसे तो, पर आजकल "hygeine" reasons के कारण ऐसा करना ठीक नहीं बताया जाता..... मौसम का रहमो करम जारी है, आज भी पानी बरसा, और शाम तक मौसम सुहाना ही बना रहा.....बचपन में इस मौसम में हम अंगूर के पत्तों के पकोड़े खाया करते थे..:)....भुट्टे पे नींबू और नमक, आलू प्याज के पकोड़े....और चीला....ये बरसात के मौसम के पर्यायी हुआ करते थे, हो तो वैसे अभी भी सकते हैं, अगर कोई बना के दे दे तो..:)..अपने से रोज़ इतनी मेहनत मुश्किल लगती है थोड़ी .... वैसे इस बरसात में मैंने १ बात जानी....ये ही १ ऐसा मौसम है, जिसमे भारत के लघभग सभी मैदानी शहर १ जैसे लगते हैं, अच्छे...:)....बारिश चाहे चेन्नई में हो...या दिल्ली में....या हमारे झांसी में....बारिश के वो ३-४ घंटे हर शहर की हवा को इतना साफ़...ठंडा ..और सुकूनमय बना देते हैं कि शायद १ यही मौसम है जिसमे दिल्ली क्या..हैदराबाद क्या...कहीं भी बस जाने का मन करने लगेगा.. ...बारिश हो जाने पर ये सूखा धूल भरा गुडगाँव शहर भी रहने लायक लगने लगता है..(- traffic ofcourse) ..

ये पोस्ट लिखी थी कुछ १ महीना पहले.....लिखा तो इसके बाद और भी बहुत कुछ था...पर save नहीं किया ....तो ये पोस्ट इतनी ही रह गयी.....
उस दिन कुछ तस्वीरें लीं थीं..अपने कैमरे से.....अब पाईये नीचे.....


















कुछ दिन पहले हम जयपुर गए थे ऑफिस की तरफ से.....बारिश के मौसम में ऐसा लग रहा था की हम राजस्थान में नहीं...बल्कि दक्षिण भारत के किसी हिल स्टेशन में हैं....:)॥बड़ा मन था रुक के आमेर फोर्ट घूम के आयें, पर कम समय के कारण बस बाहर से ही देख के मन भर लिया.....


Sunday, April 18

लपूझन्ना और Bangalore की बारिश

Today is a special day. I am happy in a very different way, the way it use to be some 5-6 years back. rain God is showering blessings over Bangaluru, would soon be moving to Gurgaon, and it has finally struck me, that my abode for last three years is going to change soon. I am happy, excited and a bit apprehensive also.....all these days it was quite hot here, and the selfish me was in a way happy, that i would be moving from a not so pleasant Bangalore to Ggn and hence would not miss Bangalore weather too much...:D... But, all my wicked thoughts are being washed away every day with full showers in the evenings....so have changed my outlook, let me soak myself in the pleasant evenings of the city for a few more days....:)
Ok, so as i said today is special and hence should be marked with something very special...:)
Few days ago, N gave link of a new blog. lapoojhanna.blogspot.com. I have been a part of blogspace for past two years now. have read many interesting/ intelligent/ funny/ humorous blogs during this time. BUT, no blog like lappojhanna till now. Its unbelievably humorous and captivating. Or i would say addictive. I finished reading all the blog post series this weekend in two sittings.
मतलब कहना ऐसा रहेगा, की जिन अशोक पांडे नाम के सज्जन ने ये लिखा है, उन्होंने क्या तो पकड़ा है छोटे शहरों के middle क्लास एक्सपेरिएंस को. हर character को इतना clearly aur strongly define किया है पूरी सिरीस में, की आप दिमाग में १ पूरा नक्षा बना सकते हैं हर पात्र का, और शायद अगर असल जीवन में कभी मिल जाएँ तो पहचान भी सकते हैं..:) (ऐसा मुझे Shantaaram और Kite Runner पढ़के भी लगा था ) उत्तराँचल में रामनगर नाम के १ प्लेन्स के कसबे के कुछ पात्रों (mainly लफ्तू और पाण्डेय जी स्वयं) के बचपन के जीवन का कुछ ऐसा विवरण किया है लेखक ने, कि रामनगर की १ तस्वीर सी खिंच जाती है दिमाग में; और कुछ posts पढने के बाद, आप कहानी का हिस्सा ही बन जाते हैं। लेखक का ओब्सेर्वेशन अमेज़िंग है, इतना बारीकी से सन ७० के दशक में भारत के हज़ारों कस्बों में से किसी १ में रहने वाले बच्चों के मन, मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विचारों और भावनाओं को कागज़ पे उतारा है, कि बस पढ़ने वाला वाह वाह ही कर उठे.... और सबसे खूबसूरत बात ये...कि सारी कहानी में हास्य का इतना गहरा और रोचक पुट है....कि हँसते हँसते आँखों से पानी आ जाए..पेट दर्द करने लगे...और आप सचमुच "रोलिंग ऑन the फ्लोर" हो जाएँ।
शब्दावाली के साथ ऐसा creative experiment कि हर पोस्ट में कम से कम १२-१५ हीरे तो आसानी से मिल जायेंगे...:)....परजोगसालासहायकार्धांगिनी (लैब assisstant की धरमपत्नी), सार्वजनिक मारपीटीकरण और अपमानीकरण.....उनमे से कुछ हीरे हैं...:)
तहे दिल से धन्यवाद लेखक का और N का, जिन्होंने इस ब्लोगाधिपति से परिचय करवाया...:)
बाकी आज शाम से कुछ मस्त गाने सुने जा रहे हैं, जो कि इस अच्छे मूड पे और चार चाँद लगा रहे हैं...:) ..

Sunday, April 4

दिन पुराने..

I finished reading MIHYAP today. Shri greatbong ne badi achchi kitaab likhi hai. The DD generation kids are going to like it for sure. Now when i look back, the trasition appears so clear, from the almost restrictied economy and one channel days to the sudden changes in 92-93, with economic liberalization and with that the deluge of new avenues opening to the Indian youth.
The scenario then chnaged very fast..and suddenly our good old Doordarshan also became a thing of past.....the book touches some sublte and some prominent facets of those times....the times of much limited opportunities, resources and of course entertainment..:)

किताब पढके कुछ अपने बचपन के दूरदर्शन दिन याद आ गए....:D

१. वो दूरदर्शन के दिन भी क्या ही दिन थे....:)......१ दम unique experience, मुझे याद है अक्सर टीवी देखते समय कभी कभी स्क्रीन धुंधली होने लगती थी, या मच्छर types आने लगते थे....तो दिमाग में पहली बत्ती जलती थी, की ज़रूर antennae में कुछ गड़बड़ होगी तो दौड़ के हम तीनों (भाई बहनों) में से कोई छत पे जाता था, और वहीँ पर रखे १ लम्बे बांस से antennae को ठीक करने (घुमाने/ मारने) की कोशिश करने लगता "ठीक हुआ"..."अब ठीक है"...."और घुमाओ"...."मनु, जैसे कल किया था वैसे ही करो"...जैसे कई निर्देशों के आदान प्रदान के बाद.....अमूमन २-१५ मिनट की कोशिश के बाद अक्सर टीवी महाराज ठीक हो ही जाया करते थे.....ये सिलसिला शायद ९५ में बंद हुआ होगा, जब घर में cable लग गया ..:)

२. Bollywood के फैन तो हम बचपन से ही थे, उस समय नयी फिल्मों के गानों की १ झलक देखने के लिए, Wed या Friday को चित्रहार का इंतज़ार करना पड़ता था उसमे भी कोई gaurantee नहीं की भाई latest गाने आ ही जायेंगे तो, अखबार के "आज के कार्यक्रम" हिस्से में पढ़ के पता चला, की DD 2, यानी DD Metro नाम का १ DD1 का भाई चैनल है, जिसपे Sat या Sun को रात को कोई Superhit Muqabla नाम का show आता है , जिसमे कि सप्ताह के सबसे popular गाने दिखाए जाते हैं Baba the Great Sehgal ने इसका title song गाया था..:). अब DD2 तो हमारे यहाँ आता नहीं था, वो तो सिर्फ metros में आता था....तो क्या किया जाए, हमें कहीं से पता चला..कि दिल्ली के आस पास वाले शहरों में metro आता है...हमारा शहर दिल्ली से ठीक 299 km दूर है..:)..और आप कितनी भी कोशिश कर लें channels बदल बदल के TV पे ज़ुल्म ढाने की, आप "superhit" तो क्या, कोई flop मुकाबला भी नहीं देख पाएंगे, पर जैसा की मैंने जीवन के कुछ ३०-..:D सावन/ भादों/बसंत/ बहार के बाद जाना है, की मैं बचपन से ही बड़ी जुझारू प्रकृति की हूँ....ऐसे ही सुनी सुनाई बातों पे विश्वास करना...वो भी उन अनमोल गानों के लिए.....मुझे बिलकुल भी मंज़ूर नहीं था........तो बस फिर शुरू हुआ channels adjust करने का सिलसिला, anteannae कि दिशा बदलने का कार्यक्रम, और भी न जाने क्या क्या....बहुत कोशिशों बाद किसी १ channel पे metro आता महसूस सा हुआ....बस इतना..की आप पता ही कर पाए..की ये DD1 के अलावा कोई और चैनल है.....यानी मेट्रो है...:)..:)..:)...पर....."Sehgal" जी की सुरीली आवाज़ में शुरू होने वाला वो मुकाबला हम और हमारे जैसे कई फिल्मों के दीवानों की किस्मत में नहीं था....बहुत कोशिशों के बावजूद ये पाया गया..की "reception" बहुत ही खराब है...और अगर इसी तरह इस TV के कान खींचते/ मरोड़ते रहे तो कुछ और हो न हो..पिताजी अपनी इस मेहनत की कमाई से ऐसा दुराचार कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे, और किसी दिन हमारे ही कान खींचे हुए पाए जायेंगे...तो हम..यानी की मैं और मेरी प्रिय सहेली अरुणा, जो की इस और इस जैसे कई और सर्कसों में मेरी साथी हुआ करती थी.... ने अंततः हार मान ली..और वापस रुख किया..रंगोली और चित्रहार की ओर.:)

DD से जुडी बड़ी सारी बातें हैं जो याद हैं, और किताब में बड़े ही रोचक तरीके से ८० और ९० के दशक में सर्वव्यापी prcatices का विवरण किया है...:)...फिर वो चाहे दूरदर्शन हो, या advent of internet या बॉलीवुड का असर.....Greatbong ने लोहा और गुंडा फिमों का भी अनोखा विवरण किया है..:)...दोनों ही फिल्मों पर इतनी गूढ़ दृष्टि डालने के लिए उनका बहुत बहुत शुक्रिया...:)
खैर, दूरदर्शन पे १ चिटठा कुछ भी नहीं है...:).....

बहुत देर से youtube से कुछ पुराने अच्छे धारावाहिकों के title songs download करने की कोशिश कर रही हूँ ताकि वो यहाँ चेपे जा सकें और माहौल को और रूचिपूर्ण किया जा सके, पर लगातार असफलता ही हाथ लग रही है, १२:०० से ऊपर समय हो चूका है, और ये पोस्ट कल पर टालने का मन नहीं है......तो मैं ऐसे ही याद कर लेती हूँ DD 1 के कुछ पुराने serials जो मुझे विशेष प्रिय थे..:)
सुरभि.....और उसका वो "प्रभादेवी, मुंबई" वाला address...:)
दाने अनार के....एवं मुंगेरी लाल के हसीन सपने...दोनों में ही रघुवीर यादव थे....पता चला है की आजकल वो missing हैं..:O
कशिश- मालविका तिवारी और सुदेश बेरी के amazing romance की कहानी..:)
तस्वीर- ये Sun को ११ बजे के आसपास आया करता था, बड़ी मुश्किल से इसे देखने की इजाज़त मिली थी, शायद exams से कुछ दिन पहले ही शुरू हुआ था.
.तलाश- किसी उपन्यास पर आधारित, विजयेन्द्र घाटके और नीलिमा अज़ीम (अपने शहीद कपूर की मम्मी..:)) और इसका title song पुरानी फिल्म तलाश से ही था...
होनी अनहोनी- ये Thursday को आता था...अजीब पर अच्छा
Stone Boy- aha....a story about the kids of an Indian family in Mauritius, the young boy meets a stone boy (who was once a stone or something)...and the adventures that follow....i wish i could get this series from somewhere..btw the kid who played the stone boy -Ankur Jhaveri also played Arjun jr in Mahabharat,...
Flop Show,..he he..naam hi kaafi hai..:D
नीम का पेड़, हम लोग, किले का रहस्य.. रंगोली.. the Sat/ Sun movies..... one post as i said is nothing to revisit the DD memory lane...:)

Friday, March 12

Chirraiyya..

One of my best friends got married in Feb 2007. I came to Delhi from Chennai to attend her wedding…like most brides she was a bit scared a bit apprehensive…basically pre-nuptial jitters had taken the better of her. But the thing which was worrying her the most was, “shaadi vale din main kaise dikhungi”. Bhai baat sahi bhi hai, so many people would come to attend the wedding, the bride-groom would be on an elevated platform and many cameras and at least one video vale uncle would be constantly focusing on you….”kaise dikhne” ka darr banta bhi hai…..She went to one of the best parlours in Delhi, and it would be unfair to her if I say she was not looking pretty…:)
I, being her best friend was given the responsibility of being with her all the time during and before the wedding…..me being the constant source of “baatein-gyaan bhari”..:D…was joking on one or the other thing constantly..and she was requesting/ asking/ shouting at me to pls be quiet so that she is not forced to laugh and her make up stays tucked….
For a long time I very clearly remembered how worried a girl can get about “how she looks” on her big day……
Then came my turn on the 6th day of February this year and i realised that my memory had failed me big time....
Before my wedding, I zeroed down on a parlor, based on same good reviews and a aankhon dekhi bride…a friend told..shes good…aunty thora pakati hain, किसी की सुनती नहीं हैं पर ठीक हैं चलो भाई..सही है, इन्ही के पास चले जाते हैं...वैसे भी I always felt, that सारी दुल्हन १ जैसे ही दिखती हैं, red कपडे, same makeup….और शादी में दुल्हन को कौन देखता है....:D -yes, I use to think that…:O…sab khane peene naachne gaane mein mast/ vyast hote hain…..I completely missed the fact, that शादी में कोई और देखे न देखे, शादी की एल्बम जीवन भर साथ रहती है, aur re-create nahi ki jaa sakti...:(
What followed was a sequence of events which would soon result in the images in my Shaadi ki Album...:)
शादी वाले दिन हम पहुंचे पार्लर वाली आंटी के यहाँ उन्होंने अपनी जादुई chair पे बैठाया....और कहा चलो बेटे, आँखें बंद कर लो....ढीट बच्चों की तरह कहना न मानते हुए मैं हर आधे मिनट में आँखें खोल के देखने लगी, इस बीच पाया ये गया, की आंटी ने foundation, concealer, dunno what1.....foundation, concealer...dunno what2...foundation..concealer....dunno what3.... के न जाने कितने layers से मेरे otherwise ok दिखने वाले चेहरे को "सज़ा" दिया...:( ...खैर....इसके बाद आंख्ने खोल के मैंने जैसे ही अपना चेहरा शीशे में देखा ढंग से....."आंटी ये तो बहुत ज्यादा हो गया है" ..x-(....
" अरे हाँ, ऐसे ही होता है bridal makeup, ये सब अभी थोरी देर में "seep in" कर जायेगा..."..आप चुप चाप आंख्ने बंद करके बैठे रहो..."..:O
मेरी प्रिय सहेली जो मेरे साथ गयी थी.." तू चुप चाप बैठे रह...ये अभी सब skin absorb लेगी..."....सब light हो जायेगा..."
अच्छा जी....चलो, अपनी दोस्त पे मुझे फिर भी थोडा भरोसा था....
उसके बाद १ और round आँखें बंद करने का हुआ, और इस बार शिकार पे थीं मेरी आँखें ....जब आंख्ने खोल के देखीं, तो beyond repair damage हो चुका था...."सीता माता की जय हो" बस यही शब्द गूँज रहे थे मन में.....
Parlor में मौजूद अपनी बहेन, अपनी cousin, अपनी १ और परम मित्र की और देखा, की शायद मेरी ही आँखें धोखा खा रही हों...और सच्चाई शायद थोरी फरक हो.....पर होनी को तो आज कुछ और ही मंज़ूर था....उनके चेहरों पे जो scorecard दिखा अपने इस "bridal" रूप का....मेरी रूह थरथराने की चरम सीमा पार कर गयी....
खैर, इसके बाद कुछ और painting हुई, आसपास की जनता तैयार हो रही थी, और बीच बीच में सांत्वना भरी नज़रों से मुझे देख रही थी...
अब तक मैंने मन को समझा लिया था, की जो है सही है...जाने दो...
इस सारे circuis के अंत तक मुझ पे me-the bride हावी होने लगी थी, और उस जादुई कुर्सी से उतरने के बाद जब मैंने खुद को शीशे में देखा, तो लगने लगा, की "अरे ठीक ही लग रही हूँ यार मैं.."...ये मेरे अंदर की bride बोल रही थी; मैं पूरे शादी mode में आ चुकी थी....
Parlor वाली आंटी को goodbye बोल के निकल पड़े "wedding hall" की ओर...
अब शुरू हुआ...१ नया सिलसिला....जो थोड़े बहुत doubts थे मन में अपनी इस रंगों से सजे चेहरे को लेके वो सब दूर हो गए....
सभी मौसी, मामी, चाची, ताई, बुआ-ओं ने देखते ही अपना फ़र्ज़ भरपूर तरीके से निभाना शुरू किया..."अरे बेटा..कितनी सुंदर लग रही है....."
"बहुत ही सुंदर बेटा...बहुत प्यारी लग रही है..."
वाह वाह ..मन मयूर नाच उठा....मतलब मैं १ दम सही सोच रही हूँ....."मैं अच्छी लग रही हूँ..."...YAY!!
खैर.....इसके बाद १ के बाद १ शादी के कार्यक्रम होने लगे.....और दिमाग चेहरे से हट गया.....जब तक मैंने शादी के फोटो नहीं देखे और उन्हें अपने मित्रजनो को नहीं दिखाया....:D
जब मित्रों को कुछ "अच्छी" तस्वीरें भेजीं....तो वार्तालाप कुछ ऐसे हुआ...
me: bhej din pics...
friend: okies..lemme check
*after a good 2 minutes*
me:??
milin??
friend: abe tu to 1 dum diff lag rahi hai...
me: :)
*another 2 minutes*
me: diff as in???....
friend: hmm.....
me:????
*again 2 min*
friend: u are looking very diff....lag hi nahi raha ki tu hai...
me: phew!!!..ok, to jo main lag rahi hun.."vo" kaise hai??
friend: :)).....tu 1 dum bride lag rahi hai....:)
me: :O.....
met a dear cousin in Hyd after marriage...he had seen the made up me at the wedding...
cousin: abe tera chehra to bahut glow kar raha hai.....shaadi ka make up abhi tak bach rakha hai kya face pe...:D..:D
I couldnt help but laugh....:D
Sent the pics to a friend who apparently wanted to se me in lehnga and make up etc....she never replied after seeing the pics...:)
Anyways, sis has already decided that shes not going to the same "parlor vaali aunty", on her big day!!
I am still waiting for the official album, hoping that the photoshoped pics would be somewhat better...:D
The only silver lining in all this make up circuis was that husband dear found it perfectly fine and thought that the bride me was looking good....:))
Am listning to this song after a long time, and as usual..loving it..:)
PS: Post on shaadi is still not complete, will post it soon...:))
Title of this post is a word from one of the folk songs which were being sung at my sasuraal when i reached there..:)..i loved that song and specially this word. It has nothing to do with the post otherwise..:)

Monday, January 18

Limca पियोगे?

हमारे जीवन में Limca - the cold drink का बड़ा महत्व रहा है. बचपन से ही हमें काफी कम पानी पीने की आदत थी. पिताजी को हमारी कई और आदतों के साथ ये भी कुछ विशेष प्रिय नहीं थी. घर में तो वो इस पर कुछ विशेष ध्यान नहीं दे पाते थे, पर जब भी हम कहीं travel कर रहे होते थे, invariably सफ़र में औसतन ५-६ बार वे अवश्य पूछते थे, "बेटे, गर्मी है, तुम्हे प्यास लग रही होगी...Limca पियोगे" ....अब मुझे आज तक, ये समझ नहीं आया, की why only Limca??...:D. मुझे बचपन से लेकर आज तक पिताजी के साथ लिया हुआ कोई भी सफ़र याद नहीं है, जिसमे उन्होंने Limca के अलावा किसी और ठन्डे पेय का नाम लिया हो...:). मुझे याद नहीं पड़ता की कभी मैंने Limca के प्रति अपना कोई विशेष प्रेम या liking दिखाई हो, या कभी जिद करके ही Limca पीनी चाही हो.
वैसे और अवसरों पे ( घर पे मेहमान आने पर... इत्यादि) पापा हमेशा कहते थे/ हैं की भाई ठंडा ले आओ कुछ....पर, सफ़र में सिर्फ Limca...:)
ख़ैर, फिर जब हम बड़े होने लगे तो हमने अपनी पसंद बतानी शुरू कर दी, कि पापा coke पीयेंगे...:D, to which of course he agreed instantly, but the preference for Limca especially while travelling is still a mystery to me...:)
PS: This is one of the many interesting... incidents/facts I can recount about dad....:)....
A friend sent this song yesterday, and I can't stop listening to it since then...:)

Friday, January 15

दिन भर...

आज बड़े दिनों बाद पटूरी (चीला) बनायीं. दही, ketchup और मिर्च के अचार के साथ खाया....:) और बड़े दिनों बाद ketchup और दही १ साथ खाए....bliss!! is the word....:) fotu खींची जो की काफी थकी हुई सी आई, but चिपका देते हैं...:)


बाकी ketchup से मुझे kissan tomato ketchup का ad याद आया...:D. मुझे ये ad बड़ा पसंद है...:) I simply love the presentation of this ad..:)

A primetime serial ended on star plus today, ended as in the story was taken to a logical..hmm..dunno..but ye to a conclusion....-A miracle indeed!! ..:D
21 days to go now for the d-day....:) आज १ मित्र ने पूछा...."गुड गुड होने लग गयी है??"....मैंने कहा जी अभी तो नहीं, but knowing myself soon ही होने लगेगी...:))

I saw the Mumbai Marathon ad recently. The background music of " हम होंगे कामयाब" sounds so awsum ....took me back to the school days, we use to have this as a special song as part of the morning prayer, like twice every month ...just before the national anthem...:)

Wednesday, December 16

फुर्सत

आज ऑफिस में १ कांफेरेंस कॉल थी, शाम ७:३० बजे पूरी तैय्यारी के साथ कॉल का वेट किया, लॉग इन भी किया, लेकिन सामने वाली पार्टी को यू एस ऑफ़ ए में किसी अनियोजित कार्य ने घेर लिया शायद और कॉल कैंसल...:) १ दम ऐसे लगा जैसे की बचपन में बारिश वाले दिन पानी से भरी सड़कों से जूझते हुए स्कूल गए हों...और "Rainy day" घोषित हो गया हो....:)...अलौकिक आनंद की अनुभूति....:)
इसी ख़ुशी के अवसर पे ये मधुर गीत.....

वैसे इस "जैसे" के बाद कई उपमाएं लग सकती हैं.....
-जैसे ....इंजीनियरिंग में सेमेस्टर रिजल्ट आने की खबर, अफवाह साबित हो गयी हो....:D
-जैसे....CAT का इम्तिहान जो अभी अभी आप बर्बाद करके घर आये हैं वो रद्द हो गया हो....:)
-जैसे....सुबह आधा घंटा पहले आँख खुल जाए...और फिर मन प्रफुल्लित हो उठे की वाह! थोडा और सो सकते हैं....:)
-जैसे ...आपको printouts के लिए pages चाहिए हों रात के २ बजे, और कोई भला मानुस अपने A4 शीट्स लैब में ही भूल गया हो...:)
जैसे ...न जाने क्या क्या.....:)

१ मित्र ने आज अपनी पहली नौकरी से इस्तीफ़ा दिया...और उन्होंने इस "resigning" अनुभव का विवरण कुछ इस प्रकार किया ...."ऐसा लग रहा है जैसे कि किसी giant wheel में बैठ के नीचे आते समय लगता है."...:)....नई नौकरी कि आपको ढेरों बधाइयाँ... !!
खैर....ऐसा thrilling अनुभव हमें भी जल्द ही हो ...तब तक हम ऐसे "call cancel" types अनुभवों में ही खुश रहते हैं...:)

Saturday, August 22

राह पे रहते हैं...

एक अनमनी सी दोपहर...खिड़की के पास बैठे हुए, कोशिश की कि थोड़ा सा आसमान, थोड़े से हर घड़ी रंग बदलते बादल, थोड़े से पेड़,..कहीं कुछ दिखाई दें....बहुत कोशिशों के बाद भी सामने बस एक बड़ी सी पीले रंग की दीवार, कुछ खड़ी गाड़ियों के अलावा कुछ न दिखा....तो बाहर से आती ठंडी हवा को ही अपने हिस्से की प्रकृति मान लिया....और फिर वापस उसी खिड़की की ओर रुख़ किया जो शायद अब हमारा इकलौता झंरोखा है इस दुनिया को देखने का....
गुलज़ार साहब के शब्दों को बड़ी खूबसूरती से पंचम दा ने गीत में पिरोया है....और आप हम जैसे किसी प्रशंसक ने कुछ उम्दा तस्वीरें डाल के ये सुंदर विडियो बना दिया है ...
A beautiful song with some amazing locales reminding of the nature's bliss, we are far away from......

Saturday, August 8

The z axis and irrational happiness..

आज शुक्रवार की शाम है.....ऑफिस में विशेष काम था नहीं, तो हमारे दिमाग में भांति भांति के विचार आने लगे; जब से नौकरी करना शुरू किये हैं, शुक्रवार नामक इस दिवस ने ज़िन्दगी में एक अलग ही स्थान प्राप्त कर लिया है; शुक्रवार की शाम आते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है, आगे दो दिन की छुट्टी है....ऐसे लगता है मानो बस इन्ही दो दिन का इंतज़ार था..अब हम विश्व विजय कर लेंगे....वो सारे काम, जिनका चिटठा लिए हम हफ्तों से घूम रहे हैं; इसी सप्ताहंत में सभी का निर्वाह करके, आनंद और कर्त्तव्य परायणता की चरम सीमा को छू लेंगे...:) अगर पिछले दो सालों पर नज़र डालें तो विरले ही ऐसे सप्ताहंत रहे हैं जहाँ हमने खुद से किये गए कुछ वायेदों को निभाया है; अमूमन शनिवार और रविवार घर पे ही आराम फरमाते हुए, बचे हुए कुछ कामों को थोडा सा अंजाम के और करीब पहुंचाते हुए निकल जाते हैं; किन्तु शुक्रवार की शाम को जो मन मयूर में माहौल होता है..उसमे कोई विशेष अंतर नहीं आया है ..:)...आज ऐसे ही मन में विचार आ रहा था...कि क्या शुक्रवार सचमुच इतना मत्वपूर्ण होता है??? ....सांख्यिकी को अगर ध्यान में रखा जाए तो ९०% लोग ऐसे होंगे जो सप्ताह में इतना काम करते हैं, जिसे की सामान्य ऊर्जा स्तर से इति की ओर पहुँचाया जा सकता है ..और जिसके बाद २ दिन के अविघ्नकारी अवकाश की आवश्यकता नहीं होती....किन्तु हमारा मन मस्तिष्क इस तरह से यंत्रस्थ किया जा चुका है कि अगर ऊपर से निर्देश आ गए की इस शनिवार/ रविवार आपको ऑफिस आना पड़ सकता है, तो हम मानसिक रूप से ही इतने थक जाते हैं कि काम क्या ही हो पाता है....

Ok, as I write this post i realise, that I have lost all my grip over Hindi..:(...framing one sentence is taking more than 2 minutes, which by all standards is too too much, needless to mention the help from some random site and kind souls like N. I remember, there use to be a time when I was more of a Hindi person. Writing in our mother tongue came all very naturally. In addition to scoring highest marks in Hindi literature and grammar ..I use to be an active member of Hindi debate and writing club..:( .English was something which needed efforts, I still remember my first essay in English in class IV....I was disqualified from participating in a district level essay competetion as I committed some gross mistakes in my writing on "The Gulf War"-1991 (mistakes are too embarrassing to be mentioned here..:))....the remainder of this post has to be in Hindi...no matter how much time it takes.... "Shukra hai Shukravaar hai" can take a back seat...I guess I am more tempted to go down the "Hindi" memory lane :)

हमारी पीढी के अधिकाँश उत्तर भारतीय बच्चों की तरह हमारे घर में भी हिंदी का ही वर्चस्व था; हमारी मातृभाषा गढ़वाली है, और अक्सर माँ एवं पिताजी गढ़वाली में वार्तालाप करते पाए जाते हैं; किन्तु रोजमर्रह कि ज़िन्दगी में, और आसपास के वातावरण में भी हिंदी ही सबसे प्राभाव पूर्ण भाषा थी; हमारी माताजी संस्कृत/ हिंदी कि अध्यापिका हैं, दोनों ही भाषाओं में निपुण हैं, एवं पिताजी अलाहबाद विश्वविद्यालय से स्नातक तो हिंदी या यूँ कहिये काफी शुद्ध हिंदी में घर में वार्तालाप हो जाया करता था... मुझे याद आता है जब मेरे भाई बहिन का कक्षा १० का परिणाम आया...और वो अपेक्षा के अनुसार नहीं था; हमेशा की भाँती दोनों समझदार बच्चे सो गए...:) सोये रहेंगे तो पिताजी के प्रवचन कम सुनने मिलेंगे.....पिताजी ने शुध्ध हिंदी में कटाक्ष किया....
" ये पलायनवादी दृष्टिकोण कोई विशेष मदद नहीं करता है जीवन में"..:D
उनके मुह से ऐसे वाक्य अक्सर सुनने मिल जाया करते थे...
" दीप्ति, तुम में व्यवहारिक ज्ञान और विवेक कि कमी है "......
" मेरी बातें तुम्हे अभी कटु लगेंगी, पर बेटा, सत्य यही है कि देर से उठने वाले जीवन में बहुत आगे नहीं जाया करते"
"समय समय पे आत्म विश्लेषण अति आवश्यक है"
ऊपर लिखीं बातों को हमने जीवन में कितना अपनाया, इस पे तो टिपण्णी नहीं करुँगी ....पर घर में शुध्ध हिंदी कोई बहुत दूर कि चीज़ नहीं थी....माताजी अक्सर हमारे गलत उच्चारण को सही कर देतीं थीं.....फूल (phool) ओर फूल (fool) में अंतर करना उन्होने ही सिखाया.....मौसियों और चाचियों ने जब अपने बच्चों के कठिन नामों (जैसे: कनिष्क) को गलत हिंदी में लिखा तो माताजी ने आगे बढ़के "श" और "ष" में अंतर बताया...कक्षा ६ से १० तक, नवीन भारती, पराग, स्वाति (हमारी हिंदी पुस्तकें) के सभी गद्य और कविताओं का भावार्थ, प्रसंग और भी न जाने क्या क्या, को अत्यंत भावपूर्ण तरीके से लिखवाने में माताजी ने कोई कसर न रख छोड़ी ; हमने भी हिंदी में उच्चतम अंक पाके, उनको गौरवान्वित किया....और १ हिंदी अध्यापिका कि सुपुत्री होने का कर्त्तव्य पूर्ण रूप से निभाया..:) खैर, कहने का तात्पर्य ये है कि आसपास अच्छी हिंदी का माहौल था.....कक्षा ११ तक हम हिंदी वाद विवाद प्रतियोगिताओं में न केवल भाग लिया करते थे..बल्कि प्रथम या द्वितीय स्थान प्राप्त करके विद्यालय के गौरव को बढाते थे... (इन प्रतियोगिताओं में शीर्षक कुछ ऐसे होते थे: भारतीय राजनीति में धर्मं का हस्तक्षेप-कितना उचित/ अनुचित) ऐसे विषयों का ६विन कक्षा में न तो सिर समझ आता था न पैर ..:) ८-१० पन्नों का १ झुंड हमें पकडा दिया जाता था......"बेटा, ये बोलना है...."...हम ख़ुशी ख़ुशी कर्तव्यपरायणता से उसे याद कर लेते थे....और किसी भी प्रतियोगिता में जाके.....मंडल/ जिले के हिंदी विद्वानों के सामने पूरे आत्मविश्वास एवं भावनाओं के साथ उगल दिया करते थे.....(Dias के पीछे hearbeats कितनी तीव्र गति से दौड़ रही होती थीं; इसका अनुमान शुक्र है किसी को कभी नहीं हुआ:) )

आज जब पीछे देखती हूँ तो याद पड़ता है...घर में १ रामायण हुआ करती थी....किसी हिंदी गाइड कि तरह दिखने वाली वो पुस्तक, २-३ भागों में थी.....हमने कक्षा २-३ में....पूरी रामायण (उत्तर रामायण सहित) ऐसे ही यहाँ वहां डोलते हुए पढ़ डाली थी (कहने कि आवश्यकता नहीं है..कि पुस्तक अत्यंत सरल हिंदी में थी)..... थोडा और बड़े हुए तो घर में रखे सभी शिवानी के उपन्यास (शिवानी हिंदी कि १ बहुचर्चित लेखिका हैं- उनकी सुपुत्री मृणाल पाण्डेय कुछ समय पहले तक हिंदी समाचार वाचिका थीं) पढ़ डाले; रुचि का १ कारण ये भी था कि सभी कहानियां/ उपन्यास गढ़वाल/ कुमाऊं का बड़ा ही रोचक वर्णन करते थे;

जब तक हम कक्षा १० में थे, घर में हिंदी अखबार नवभारत टाईम्स आया करता था; अखबार के मुख्य उपभोग्कता हमारे पिताजी थे, जो कि किसी भी दिन हिंदी भाषा से ज्यादा प्रेम/ तालुक रखते थे; स्कूल से आते ही, हम बिना change किये पहले पूरा अखबार पढ़ते....लोकल से ले कर विदेशी ख़बरों तक में सामान रुचि हुआ करती थी....फिर कक्षा ११विन में ये अहसास हुआ, कि reading an English newspaper would any day be more beneficial:))..तो घर में टाईम्स ऑफ़ इंडिया भी आने लगा.....उसमे भी हमारी रुचि बस सन्डे टाईम्स में ही रहती थी....बाकी का अखबार अक्सर खाना खाते हुए बिछाने के काम आता था या अपनी अलमारी में किताबों के नीचे बिछाने के..:) इसी बीच हमने कहीं Readers' Digest और CSR देख लीं..:)..तो घर में वो भी आने लगीं.....ये दोनों ही बड़े मन से पढ़े जाते थे.... (Readers' Digest deserves a complete post in itself-its one of the most captivating reads I have ever come across).
खैर, हिंदी भाषा से ताल्लुक शायद वहीँ तक था; इधर हम घर से बाहर निकले जीवन में कुछ कर दिखाने के लिए..:P...उधर मातृभाषा से तार टूटने से लगे....इंजीनियरिंग कॉलेज में आके पहले दो साल तो "कुछ भी नहीं पढ़ा"..:D..उसके बाद जब लगा कि अब आगे क्या.......तो MBA रुपी जीव सामने दिखाई पड़ा........बस....तब से जो अंग्रेजी भाषा से नाता जुडा है..आज आलम ये है कि......इस पोस्ट को लिखने में इस साईट से लेके श्री N का सहारा लेना पड़ा......फाइनल इयर में The Hindu , आसपास पायी जाने वालीं सभी अंग्रेजी magazines पढ़ी जाने लगीं.....हर वो लेख जो कि कठिन हो, जिसका सिर, पैर ना समझ आ रहा हो....उसपे शोध होने लगा... TOI का एडिटोरिअल जो मैं पूरे होशो हवास में मुश्किल ही पढ़ती हूँ कभी, पूरी शिद्दत एवं तल्लीन्त्ता से रुचि लेके पढ़ा जाने लगा...

जीवन तो इन सब में पता नहीं कितना सुधरा है....पर इतना ज़रूर है कि....हिंदी से कहीं नाता टूट गया लगता है इस बार घर गए, तो प्रेमचंद की गोदान रखी मिली १ शेल्फ में पूरे जोश से उसे तुंरत बैग में डाला. ..ये पढ़नी है....आज ६ महीने हो गए हैं किताब लाये हुए घर से......मुश्किल से ५० पन्ने पढ़ पाए हैं...:( रुचि पूरी है...पर पढने की गति इतनी चरमरा गयी है कि अब उठाने का मन ही नहीं करता....:( भाषा कोई भी हो..अपने आप में बहुत आदरणीय होती है .....किन्तु मातृभाषा में जब लिखने/ पढने में कठिनाई होने लगे तो कहीं ये बात दिल को अखरती ज़रूर है;
PS:
१. Thanks to N, for being the शब्द kosh for writing this post :)
२. गोदान शीघ्रातिशीघ्र ख़तम कर ली जायेगी.....कितना भी समय क्यूँ न लगे...:)
३. शीर्षक का लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है....शीर्षक twitter से उठाये गए कुछ वार्तालापों का मिश्रण है:)
४. पूरे लेख में पूर्णविराम की जगह ";" लगाना पड़ा है...:( ब्लॉग पूर्णविराम दिखा नहीं रहा है पोस्ट :(
ये लेख लिखते हुए सुबह के ४:३० हो गए.....निम्न वर्णित गीत ने काफी साथ दिया tempo बनाये रखने में.....इसे अवश्य सुने.....:)
http://www.youtube.com/watch?v=XJJv83-5EyQ
cheers :)

Sunday, July 26

सोना

अभी कुछ दिन पहले हमारी माताजी का फोन आया किन्ही सज्जन का हमारे लिए रिश्ता आया था, और माताजी हमे बता रही थीं..." बेटा उसकी मौसी से बात हुई थी वो कह रहीं थीं -" हमारू नौनु सोनौ च" (हमारा लड़का सोने का है) ".." मैंने कहा अच्छा, मम्मी आपको बोलना था.." हमारी नौनी भी सोने च"...कभी भी..कहीं भी...किसी भी समय सुला लो....:)....एक दम खरे "सोने" की है...:)