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Friday, September 3

अ ब्लॉग पोस्ट -६

कुछ दिन पहले पति के साथ कुछ बात हो रही थी..और बातों बातों में इंजीनियरिंग के दिनों के viva का ज़िक्र आ गया.....इंजीनियरिंग कॉलेज में किये गए फर्जी कामों की लिस्ट में सेमेस्टर एंड में होने वाले vivas की १ अलग ही जगह है......पूरे सेमेस्टर labs में रोज़ अलग अलग लीलाएं होतीं थीं....और उनकी इतिश्री होती थी सेम एंड viva voce में.......हमारे 3rd सेमेस्टर में almost सभी subjects इलेक्ट्रोनिक्स/ इलेक्ट्रिकल के थे...और हमारे कॉलेज की इलेक्ट्रोनिक्स की faculty इस दुनिया के सबसे sadist लोगों को मिला के बनायीं गयी thi...१ से बढ़ कर १.....उनका जीवन में बस १ ही मकसद था...विद्यार्थियों की वाट लगा के रखना...हर दिन...हर क्लास में..हर viva में...और ofcourse ..हर exam में.....प्रक्टिकल क्लास्सेस में अक्सर इनका झुण्ड १ ही lab में आ जाता था....और हर हफ्ते किसी नयी तरह से हमारे तीन घन्टे बर्बाद किये जाते थे...खैर....उन labs में क्या नाटक होते थे..ये कभी और.....अभी ज़िक्र रहेगा इलेक्ट्रिकल measurements एंड measuring इंस्ट्रुमेंट्स....(EMMI) के प्रक्टिकल एक्साम का...theory एक्साम्स ख़तम होने के बाद practicals हुए...generally प्रक्टिकल एक्साम वाले दिन ही उसका viva भी हो जाया करता था....अगर external examiner न हुआ..तो उसके अगले दिन....पर उस बार...examiner की availaability थोड़ी मुश्किल हो गयी...EMMI और Network Analysis एंड Synthesis दो subjects के practicals हो गए और ये बताया गया की दोनों के ही viva २-३ दिन बाद होंगे.........एक्साम्स क्यूंकि ख़त्म हो चुके थे...और viva को हमने कभी इतना important समझा ही नहीं की उसकी चिंता की जाए...तो सभी लोग एक्साम्स ख़तम होने की ख़ुशी मानाने लगे.....हमारा सालाना जलसा.."उत्सव" भी आने वाला था..तो काफी जनता उसकी तैय्यारी में जुट गयी...प्रक्टिकल एक्साम के लगभग ३ दिन बाद खबर आई की भाई आज...EMMI का viva है...viva १ फोर्मलिटी भर हुआ करती थी ५० numbers का हिसाब देने की university को...तो १ साथ ५ छात्रों को कमरे में बुला लिया जाता था....और १५-२० मिनट तक छात्रों का ragging session चलता था...जिसमे external examiner समोसे और चाय पे ध्यान केन्द्रित रखता था.....और हमारी faculty अपने जन्म भर के frustrations का बेपरवाह छात्रों से बदला ले रही होती थी.....खैर.....रोल नंबर के हिसाब से ५-५ करके जनता अंदर जा रही थी......१ झुण्ड के बाहर आते ही सब उनपे लपक लेते थे..की भाई बताओ जो १- आध सवाल दागे गए हों अंदर syllabus से...उन्ही के answers रट लिए जाएँ.....examiner घर से कोई ८-10 सवालों की पोटली लाता था..और सभी १२-१५ batches से वही सवाल पूछे जाते थे.....
खैर इसी सरपट बाजी में...१ batch गया अंदर.....अंदर गए ५ लोगों में हमारे १ मित्र थे..श्री अनुपम जैन....जो की batch के कुछ .हंसमुख...easygoing ..लोगों में से थे...इनके चेहरे पे टेंशन शायद ही ४ साल में किसी ने देखी होगी...ये localite थे...और अपनी शान की सवारी..हीरो puch पे कॉलेज आया करते थे....3rd सेमेस्टर तक इनसे कोई विशेष दोस्ती तो नहीं हुई थी...पर इनके टेंशन फ्री attitude को जनता ने जान लिया था...खैर......पाँचों जन ने examiner और internal faculty के सामने अपनी अपनी सीटें ले लीं...और pseudo राग्गिंग चालू हो गयी....batch में १ और सज्जन गए थे ..जो की क्लास के सबसे हुर्ष्टपुष्ट और विशाल जीवों में से थे...पर स्वभाव से काफी गंभीर थे...उनसे examiner ने १ सवाल पूछा...जिसका उत्तर देने के लिए उन्होंने सोचना शुरू किया....(या शायद सोचने का नाटक शुरू किया)......खैर ...जब वहां से कोई उत्तर नहीं आया तो ..सवाल अगले छात्र पर carry फॉरवर्ड कर दिया गया.....सवाल टालने का ऐसा ही सिलसिला चल रहा था कि जैन साहब को अचानक हंसी आ गयी.....आपको सवाल का जवाब न आये..कोई बात नहीं....आप गर्दन झुका के बैठे रहे..कोई बात नहीं...पर अगर viva के उस concentration कैंप में.. आप हंस गए...किसी हंसी की बात पर भी...तो समझ लीजिये की आज आपका बड़ा दिन है.....जैन साहब को हँसता हुआ देख कर दोनों नरभक्षी जीवों ने उनकी ओर रुख किया...और उनसे जवाबदारी शुरू कर दी...उनकी हंसी पर २-४ लानतें फेंक कर ...उनसे कहा गया कि आप बताइये जवाब क्या होगा...... .अब सवाल जैन साहब के पाले में था...कहने की ज़रुरत नहीं है..उत्तर का तनिक भी आईडिया उन्हें नहीं था...और जितना उन्हें जाना है इतने समय में..उन्होंने शायद सवाल भी नहीं सुना था जब वो पहली बार उनके संगी से पुछा गया था.....जब जैन साहब के मुख से उत्तर का अवतरण नहीं हुआ तो ये तय हो गया कि आज की limelight के हकदार श्री जैन ही हैं....:) बाकी जनता राहत कि सांस ले रही थी कि अब बचे हुए समय में गुरु जन इन्ही की लंका लगायेंगे.....
जैन साहब को १ और मौका देते हुए एक्सामिनेर ने पूछा....कि चलिए कोई बात नहीं... आप ये ही बता दीजिये कि आपने प्रक्टिकल में कौन सा एक्सपेरिमेंट किया था...:)..ठंडी सांस लेते हुए...हमारे प्रिय मित्र ने अपने दिमाग पे जोर डाला...बहुत डाला....पर एक्साम्स ख़तम होने कि ख़ुशी शायद कुछ ज्यादा ही मन चुकी थी...दिमाग ने respond करने से मना कर दिया....और थोडा सकपकाते हुए अनुपम महाराज ने कहा.."सर वो तो अब याद नहीं.."...:D ......माहौल अब गरमा चुका था....दोनों गुरुजन स्तिथि का लुत्फ़ लेने के पूरे मूड में आ चुके थे.... इतने "कूल" छात्रों से सामना रोज़ रोज़ कहाँ हुआ करता है....मस्त हैं अपनी ही दुनिया में....खैर....एक्सामिनेर साहब का दिल थोडा पसीजा और उन्होंने सवाल को थोडा और आसान बनाते हुए और प्रक्टिकल में पूछे जाने वाले सवालों को १ अलग ही ऊँचाई पे ले जाते हुए पूछा....भाई..अच्छा आप ये ही बता दीजिये की आप कौनसे subject का viva देने आये हैं??.....:D ...अब भला ये भी कोई सवाल हुआ....माना प्रक्टिकल किये हुए ज्यादा दिन हो जाने के कारण हमें एक्सपेरिमेंट का नाम न याद हो....पर ये तो पता ही है की प्रक्टिकल किस subject का दिया था.....जैन साहब ने poore आत्मविश्वास के साथ इस सवाल को लपकते हुए झट से जवाब दिया....सर.... नेटवर्क सिंथेसिस एंड analysis ...:O .....इतना सुनना था कि सवाल पूछने वाले विद्वानों ने हार मान ली...और बाइज्ज़त श्री अनुपम जैन और बाकी छात्रों के झुण्ड को बाहर भेज दिया....:)...आज का उनका entertainment dose ज़रुरत से ज्यादा हो चुका था.....इतने की उन्हें आदत नहीं थी....:P ..

खैर..हमारे परम मित्र श्री अनुपम जैन प्रक्टिकल के उन बेमतलब क्लास्सेस से अब तक जीवन के कई milestones पार कर चुके हैं.....पिछले महीने की २१ तारिक को वे १ बेटे के पिता बने...:)...जीवन के इस सर्व्शेष्ठ्र achievement पर उन्हें बहुत बहुत बधाइयाँ....:)...
आज के Friday मूड के लिए ये गाना....


Wednesday, August 18

ब्लॉग पोस्ट-४

तेरे आने की जब खबर महके....तेरी खुशबू से सारा घर महके......
ये गाना चल रहा है background में.....
पिछली पोस्ट का डेट देखा तो एहसास हुआ की अगस्त के महीने में अब तक १ पोस्ट भी नहीं लिखी गयी है......इस वीकेंड मैं शादी के बाद पहली बार अपने घर गयी..."अपने"= मेरे mum पापा वाले घर...:)....Bangalore से गुडगाँव शिफ्ट हुए almost ४ महीने हो चुके हैं.....देश के इस हिस्से में बहुत खूबियाँ/ बुराइयां हैं...मैं गिनाने बैठूंगी तो बस बुराइयाँ निकलेंगी और ये पोस्ट कभी भी ख़तम नहीं होगी.....पर॥जैसे की मेरी अक्सर कोशिश रहती है......कम से कम इस जगह पर मैं crib करना avoid करती हूँ.....हाँ, तो अपने और सब traits के अलावा, इस जगह की खास बात ये है...की यहाँ हर समय १ अजीब सी भगदड़ रहती है....ऐसा नहीं है की मेरा ऑफिस घर से कोई दूर है और मुझे बहुत travel करना पड़ता है, या मेरे वोर्किंग hours इतने तकलीफदेह हैं की जीने मरने की नौबत आई रहती है......पर यहाँ कुछ ऐसा है की मानसिक सुकून नाम की चीज़ नदारद है.....इससे पहले भी मैं सो called "metros " में रही हूँ....पर जितनी आफत यहाँ लगती है॥उतनी कभी भी कहीं नहीं लगी......हर समय ऐसे लगता है जैसे कुछ करना बाकी रह गया आज के दिन भी....आने वाले दिन का कोई उत्साह ही नहीं लगता.....
खैर....इस सब के बाद, स्वतंत्र दिवस वाले वीकेंड पे हम निकल गए अपने घर की और....पहली बार ऐसा लगा..की यार बड़े होके कोई विशेष फायदा नहीं हो रहा है....:(
मैं पिछले दस सालों से घर से बाहर रह रही हूँ.....इन दस वर्षों में कॉलेज के दिनों के अलावा घर जाने का मौका बस ऐसे ही साल में १-२ बार मिलता था....हद से हद १० दिन के लिए १ बार में......जब तक वहां मन लगना शुरू होता था, वापस आने का समय पास आ जाता था....अक्सर सुबह ४ बजे की ट्रेन पकड़ के दिल्ली और वहां से अपने ठिकाने..चेन्नई या बंगलोरे......झाँसी जाने के लिए रात १२ बजे की ट्रेन पकड़ते थे.....जो अगले दिन १२ बजे झाँसी पहुंचाती थी...और मेरे अन्दर का आलसी जानवर.....दतिया तक सोता रहता था.....(दतिया झाँसी से ठीक पहला स्टेशन है जिसपे अगर आप नहीं उठे..तो स्टेशन छूटा समझो)...पर वापस हॉस्टल पहुँच कर १ नयी ही दुनिया शुरू हो जाती थी....और वहां ऐसे मन राम जाता था..की फिर जब तक अगली बार हॉस्टल खाली होता न दिखे मैं अपना सामन बांधती ही नहीं थी.....
चेन्नई और बंगलोरे में भी कुछ ऐसा ही हाल था....जब तक स्टुडेंट रहे.....हॉस्टल का कमरा ही घर लगता था, छुट्टियों से वापस आकर कमरा खोलते हुए लगता था...की बस, पहुँच गए अपनी जगह....चैन..राहत.....

पर पता नहीं दिल्ली (NCR) आके ऐसा कभी क्यूँ नहीं लगता......यही १ ऐसी जगह है...जहाँ वापस आके भी लगता है, की नहीं घर ही जाना है.....और ऐसा नहीं है की ये पहली बार है, अपने २००४ के १ साल के प्रवास के दौरान भी मैंने यही पाया, कि यहाँ से घर जाके..वापस आने का सचमुच मन नहीं करता.....और इस बार तो मन में ये तीव्र विचार उठा, कि ज़िन्दगी अगर कहीं है...तो हमारे छोटे शहरों में ही है.....दिन में सो जाओ..तो बस १ आवाज़ होती है background में...पंखे कि....:)....१ दम शान्ति, बचपन के दिन याद आ गए..जब स्कूल से आके मम्मी डांट के सुलाया करतीं थी...और हम तीनो भाई बहेन थोडा लड़ झगड़ के सो जाते थे...बीच में अगर उठे तो पैर भी धीरे धीरे रखने पड़ते थे कि कहीं मम्मी कि आँख न खुल जाए......और गढ़वाली में १- २ तीखे प्रहार न हो जाएँ...:D
घर से १ km के radius पर ज़रुरत की सब चीज़ें....बिना traffic में फंसने कि टेंशन के...तो अगर पापा कह के गए हैं कि "ज़रा यहीं" तक जा रहा हूँ..तो आप निश्चिन्त रहे...कि जगह सचमुच पास होगी....
पडोसी सिर्फ बाजू वाले घर में रहने वाले लोग नहीं, बल्कि ऐसे मित्र हैं जिनके चेहरे पे आपको देख के ऐसे ख़ुशी आ जायेगी..मानो उनके बच्चे ही घर आ गए हों..और आपके आने की खबर सुनकर, वो अपने आप ही मिलने चले आयेंगे......और आपके पति को अपने दामाद जितना ही मान देंगे..:)
डॉ को दिखने जायेंगे, तो उनको बस इतना कहना होगा की आप..ध्यानी जी की बिटिया हैं, बाकी वो अपने आप ही पूछ लेंगे....बेटे आपका भाई कैसा है, आप कहाँ रह रही हो..और दवाई के साथ यहन वहां २-४ बातें भी कर लेंगे.....अपने "कीमती" समय की फिक्र न करते हुए...खैर, बात का सार ये है कि सुकून से बढ़कर इस दुनिया में मुझे कुछ नहीं लगता, और इस जगह मुझे बस सुकून ही नहीं लगता.....

वापस आने का reservation छत्तीसगढ़ में था.....रात १२ बजे चलने वाली गाडी, जिसमे अपने इंजीनियरिंग के ४ साल मैंने बहुत सफ़र किया है....सुबह ४ बजे दिल्ली पहुंचा देती है....चढ़ने से पहले ही पता था..कि नींद तो पूरी होगी नहीं..१ अजीब सी बैचैनी थी मन में..."झुर्याट" कहते हैं जिसे गढ़वाली में...kisi चीज़ का मन न हो..और डर के बुझे मन से वो करना पड़े...वापस दिल्ली आने का १ अंश भी मन नहीं था.......ये झाँसी का सफ़र तो है नहीं..कि आज रात चढ़े..तो कल दिन में ही उठेंगे अब सीधे....आराम से..चैन से....शायद ट्रेन का ये छोटा हो गया सफ़र भी यही इशारा दे रहा था..कि इस सफ़र कि तरह..ज़िन्दगी से सुकून भी कम हो गया है.....manzil आ गयी है..जुट जाओ फिर काम पे.....और भागने लगो इस रेले के साथ.....


Sunday, April 25

कि तुमसे बेहतर कोई नहीं.....ये हर कली को बताऊंगा....

किसी ने अपने ब्लॉग पे पुराने गानों को श्रद्दांजलि दी हुई थी, कुछ दिन पहले. पुराने गानों से मेरा मतलब ८०-९० के दशक के वो dhinchak गाने हैं, जिनकी छाया में हमारे बचपन और लड़कपन के दिन गुज़रे हैं....वो गाने जिनपे हमने मोहल्ले के हर भैय्या/ दीदी के ladies संगीत में नाचा है, जिनकी ऑडियो कैसेटे को इतने बार सुना है की रील ही चरमरा जाए, जिनमे हेरोइनो के steps कॉपी करने में हमने अपने कई दिन लगाए हैं, और फिर घंटो चर्चा की है की कौन ज्यादा सही छाप पाया है....ऑडियो casette और tape रेकॉर्डर के वो दिन, और उनपे घंटो बजते कुछ अनमोल नगीने....

१. ये गाना मेरा "बारात" गाना है. मुझे लगता था, की ये गाना सिर्फ बारात में बैंड वाले अंकल के गाने के लिए ही बनाया गया है. क्यूंकि इसके अलावा मैंने इसे कभी नहीं सुना था. गाने के बोल हैं.."मय से..मीना से..न साक़ी से......दिल बहलता है मेरा आपके आ जाने से.."...अब अक्सर बारातों में ये कुछ ऐसे गाया जाता था कि मैं सोचती थी कि "मैसेमीनासेनासाकिसे" ..ये कोई एक शब्द है..जिसका कुछ मतलब होता है..जो सिर्फ फिल्मों में ही इस्तेमाल होता है....जैसे साजन, मोहब्बत etc टाइप के कुछ और शब्द जो की असल ज़िन्दगी में तो कभी इस्तेमाल होते नहीं है.. ..:D ..काफी बड़े होने पे समझ में आया...कि गाने "मय".."मीना"..और "साक़ी" कि बात कर रहा है...:)..और गज़ब बात ये है.....कि बारात वाले गवैय्या, इसे बड़ी original singer सी आवाज़ में गाते थे. खैर, गाना मुझे बड़ा ही पसन्द है....१ दम धमाल beats हैं..और lyrics भी अच्छे हैं..:)




२. मैंने "मैंने प्यार किया" का ये गाना चित्रहार में देखा था पहली बार .....कभी कभी १ दम नयी फिल्मों के गाने भी आ जाया करते थे.....बड़ा ही मधुर गाना है..और गाया भी बड़ी खूबसूरती से गया है. इस गाने में १ लाइन है..."ये पगला है समझाने से समझे न..", अब इस गाने में ये गाते हुए..हिरोइन हीरो को pamper कर रही थी..और वो कुछ बच्चों जैसे हरकत कर रहा था....तो मेरे समझदार दिमाग में पहला ख़याल आया..कि फिल्म में लड़का mentally retarted होगा, और ये हिरोइन इसलिए ऐसा गा रही है...:D ....infact गाने में सभी लोग नौका विहार कर रहे हैं, तो मुझे लगा कि ऐसे ही retarted बच्चों को पिकनिक पे लाया गया है....ये भ्रम बहुत दिन बाद टूटा, जब मैंने फिल्म देखी और पाया कि ऐसा नहीं है..:)....खैर ये तब कि बात है जब मैं 3rd -4rth में हुआ करती थी..तो फिल्म वैसे भी कुछ विशेष समझ नहीं आई थी...:)



३. ये गाना था "ladies संगीत" गाना. कालोनी कि हर...मतलब बिला नागा हर शादी में, मुझे और मेरी प्रिय दोस्त अरुणा को बुलाया जाता था, और हम थोड़ी सी ना नुकुर करके, नहीं आंटी...मुझे नहीं आता types ड्रामा करके, platform संभाल लेते थे....कभी कभी तो २-३ लोग १ साथ...बिना किसी तारतम्य के, देखने वाले को समझ ही ना आये..कि किसका dance देखे.....पर हमें (यानी कि हम दोनों और हमारे जैसे कई और कालोनी के budding dancers को) लगता था कि श्रीदेवी और माधुरी में competetion है नंबर १ position के लिए, फिर अगर कोई डांसर है तो बस हम..:D ...:D..खैर, ये गाना १ ऐसा सदाबाहार गाना है कि आज भी हर ladies संगीत कि रौनक बढा सकता है....



४. फिर लम्हे का ये सुपर गाना, जो आज भी उतना ही बेहतरीन लगता है, जितना २० साल पहले लगता था. लम्हे हमारे घर आने वाली first few cassettes में से थी. मुझे याद है ऑडियो cassette में ये गाना abdrupty शुरू हो जाता था, यानी..play का button दबाते ही गाना शुरू, और पहली १-आध लाइन गायब....गाना चलाने के बाद कोई खाली आवाज़ आती ही नहीं थी...इस्पे बड़ी चर्चा हुई...कि cassette खराब आ गयी है..इसे बदल के लाना होगा....जो खैर कभी नहीं हुआ...:)...."मोरनी बागा माँ बोले" इस लाइन पर मेरी सभी सहेलियों के अलग स्टेप्स हुआ करते थे....जिसका स्टेप जितना unique और creative, वो उतना बढ़िया डांसर....:D ...और स्टेप कॉपी करने कि तो बिलकुल नहीं थी, वर्ना आपको बड़ी हेय दृष्टि से देखा जा सकता था...:D ..खैर..मेरा स्टेप कुछ घुटनों के बल बैठ के types होता था...जो काफी जगह घेर लेता था, डांस करते समय....और मुझे बड़ा फक्र था उसपे..:D




५. १९९३ में रंग फिल्म आई थी. उसका ये गाना मुझे बहुत पसंद है...:)..इस गाने को तो मैंने सुन सुन के ख़तम ही कर दिया था...:D ....मुझे याद है, ये film दिव्या भारती की death के बाद आई थी, she died in the first week of April 93 i guess, we were waiting our schools to reopen after the final exams in March and i saw the news in the DD afternoon news. खबर सुनते ही मैं सरपट दौड़ी अरुणा को बताने, क्यूंकि उनके घर में दिन में टीवी थोरा कम ही चला करता था. इस के बाद कई दिन, हमारी हर गोष्ठी में इस अकस्मात् निधन पे काफी गहरी चर्चा होती रही. Infact मेरे बच्चा मन को इस बात ने इतना affect किया था, की मुझे कब ही कभी सपने भी आते थे...की मैं दिव्या भारती की death का investigation kar rahi hun...:O. दिव्या भारती के कोई रिश्तेदार हमारे शहर में रहा करते थे, और १ बार वो किसी शादी में शामिल होने हमारे शहर आयीं थी. तो हमारी क्लास के कुछ बच्चों ने उस बारात को अपनी छत से देखा था, या उस शादी में शामिल हुए थे.....उनकी काफी पूछ रही क्लास में अगले कुछ दिनों तक...:D anyways , this song is melodious, typical kumar sanu-alka yagnik style..:)




६. बाकी, फूल और कांटे फिल्म के ये गीत which thrills me in the same away, even after so many years. I love the way the hero bindaas-ly declares his love to the whole world. सीधे कॉलेज में mice पे जाके announcement करके..:D ..जिसको जो उखाड़ना है उखाड़ ले....lol .प्यार करो तो ऐसे करो..वर्ना ना करो..:D ....गाने में बात है......१ दम dhinchak ..:))....इस फिल्म के बाद हीरो श्री अजय देवगन को संन्यास ले लेना चाहिए था, और हिरोइन को यहीं टिकना चाहिए था. पर वो बेचारी तो रोजा के बाद गायब हो गयी, और ये अंकल अब तक लहरा रहे हैं....



७. १ फिल्म आई थी, जान तेरे नाम....रोनित रॉय aka बजाज ... सास बहु वाले श्रीमान, और १ माधुरी दीक्षित के जैसे वाली दिखने वाली लड़की फरहीन की, उसका १ ये गाना मुझे बहुत पसंद था..:)..आशा भोंसले की आवाज़ में अति उत्तम लगता है..:)....infact इस फिल्म का १ और गाना बड़ा hit था.."first time dekha tumhe hum kho gaya...2nd time mein love ho gaya.."....simplified, time saving प्यार..नो झोल etc....:D.....ये cassette हमारे घर में, माशूक नाम की १ और "कब आई..कहाँ गयी" टाइप मूवी के साथ था...यानी १ cassette में २ फिल्में..जैसे आजकल, CDs में आती हैं फिल्में....




८. दिल फिल्म के दो गाने मुझे बड़े अच्छे लगते थे/ हैं.....ये वाला specially ....:)...साधना सरगम और जगजीत सिंह अपनी आवाज़ में गाली भी दें तो भी अच्छी लगेगी....:)
(इस गाने का JS से कोई लेना देना नहीं है though). उस समय फिल्में देखने तो बहुत मिलती नहीं थीं, इसलिए शायद ये फिल्म मैंने आज तक नहीं देखी है, पूरी that इस. बस इतना याद है की अन्ताक्षरी में अगर "ख" से गाना आ जाए...तो "खम्बे जैसी खड़ी है" कुछ गिने चुने गानों में से होता था, जो हमे आते थे.....:)



९. ये है एक रंगोली स्पेशल गाना.....मुझे याद है, ये गाना almost हर sunday ही रंगोली में आ जाया करता था, इसकी धुन मुझे बड़ी पसंद है..:)...कुछ गुमनाम सी फिमों के कुछ गाने बड़े ही ace types निकल जाते हैं. ये भी उन्ही में से १ था...
infact ऐसा ही १ उत्तम गाना है ये भी.....

आहा...१ ये गाना है; अत्यधिक मधुर...:)..... ऐसे ही १ गुमनाम फिल्म.."कल कि आवाज़" का....इसे apparently किसी पाकिस्तानी फिल्म से चोरा गया है, खैर क्या फरक पड़ता है.....



और १ और मेरा एवेर्ग्रीन favourite गाना..kishen kanhaiyya फिल्म का...:D ...इसकी ये लाइन मेरी by default गुनगुनाने वाली लाइन है.....
"हंसी बहारों में तुमको...फूलों से मैं मिलवाऊंगा..की तुमसे बेहतर कोई नहीं.....ये हर कली को बताऊंगा....फूलों से ज्यादा..क्या मैं हंसी हूँ...दिन में न ख्वाब..दिखाओ तुम"



अनिल कपूर क्या तो हीरो है.... an allrounder when it comes to acting, dance, comedy, screen presence.... १ दम सीटी बजाने types performance ..:)
ये भी उस समय बारातों में धमाल तरीके से बजा करता था....:)

This list can actually never end..:)..with every new song i put here...another one is ready to be tagged along...:)..so will give it rest here, till the time i again feel like enumerating some more jewels of yesteryears....:)

Sunday, April 4

दिन पुराने..

I finished reading MIHYAP today. Shri greatbong ne badi achchi kitaab likhi hai. The DD generation kids are going to like it for sure. Now when i look back, the trasition appears so clear, from the almost restrictied economy and one channel days to the sudden changes in 92-93, with economic liberalization and with that the deluge of new avenues opening to the Indian youth.
The scenario then chnaged very fast..and suddenly our good old Doordarshan also became a thing of past.....the book touches some sublte and some prominent facets of those times....the times of much limited opportunities, resources and of course entertainment..:)

किताब पढके कुछ अपने बचपन के दूरदर्शन दिन याद आ गए....:D

१. वो दूरदर्शन के दिन भी क्या ही दिन थे....:)......१ दम unique experience, मुझे याद है अक्सर टीवी देखते समय कभी कभी स्क्रीन धुंधली होने लगती थी, या मच्छर types आने लगते थे....तो दिमाग में पहली बत्ती जलती थी, की ज़रूर antennae में कुछ गड़बड़ होगी तो दौड़ के हम तीनों (भाई बहनों) में से कोई छत पे जाता था, और वहीँ पर रखे १ लम्बे बांस से antennae को ठीक करने (घुमाने/ मारने) की कोशिश करने लगता "ठीक हुआ"..."अब ठीक है"...."और घुमाओ"...."मनु, जैसे कल किया था वैसे ही करो"...जैसे कई निर्देशों के आदान प्रदान के बाद.....अमूमन २-१५ मिनट की कोशिश के बाद अक्सर टीवी महाराज ठीक हो ही जाया करते थे.....ये सिलसिला शायद ९५ में बंद हुआ होगा, जब घर में cable लग गया ..:)

२. Bollywood के फैन तो हम बचपन से ही थे, उस समय नयी फिल्मों के गानों की १ झलक देखने के लिए, Wed या Friday को चित्रहार का इंतज़ार करना पड़ता था उसमे भी कोई gaurantee नहीं की भाई latest गाने आ ही जायेंगे तो, अखबार के "आज के कार्यक्रम" हिस्से में पढ़ के पता चला, की DD 2, यानी DD Metro नाम का १ DD1 का भाई चैनल है, जिसपे Sat या Sun को रात को कोई Superhit Muqabla नाम का show आता है , जिसमे कि सप्ताह के सबसे popular गाने दिखाए जाते हैं Baba the Great Sehgal ने इसका title song गाया था..:). अब DD2 तो हमारे यहाँ आता नहीं था, वो तो सिर्फ metros में आता था....तो क्या किया जाए, हमें कहीं से पता चला..कि दिल्ली के आस पास वाले शहरों में metro आता है...हमारा शहर दिल्ली से ठीक 299 km दूर है..:)..और आप कितनी भी कोशिश कर लें channels बदल बदल के TV पे ज़ुल्म ढाने की, आप "superhit" तो क्या, कोई flop मुकाबला भी नहीं देख पाएंगे, पर जैसा की मैंने जीवन के कुछ ३०-..:D सावन/ भादों/बसंत/ बहार के बाद जाना है, की मैं बचपन से ही बड़ी जुझारू प्रकृति की हूँ....ऐसे ही सुनी सुनाई बातों पे विश्वास करना...वो भी उन अनमोल गानों के लिए.....मुझे बिलकुल भी मंज़ूर नहीं था........तो बस फिर शुरू हुआ channels adjust करने का सिलसिला, anteannae कि दिशा बदलने का कार्यक्रम, और भी न जाने क्या क्या....बहुत कोशिशों बाद किसी १ channel पे metro आता महसूस सा हुआ....बस इतना..की आप पता ही कर पाए..की ये DD1 के अलावा कोई और चैनल है.....यानी मेट्रो है...:)..:)..:)...पर....."Sehgal" जी की सुरीली आवाज़ में शुरू होने वाला वो मुकाबला हम और हमारे जैसे कई फिल्मों के दीवानों की किस्मत में नहीं था....बहुत कोशिशों के बावजूद ये पाया गया..की "reception" बहुत ही खराब है...और अगर इसी तरह इस TV के कान खींचते/ मरोड़ते रहे तो कुछ और हो न हो..पिताजी अपनी इस मेहनत की कमाई से ऐसा दुराचार कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे, और किसी दिन हमारे ही कान खींचे हुए पाए जायेंगे...तो हम..यानी की मैं और मेरी प्रिय सहेली अरुणा, जो की इस और इस जैसे कई और सर्कसों में मेरी साथी हुआ करती थी.... ने अंततः हार मान ली..और वापस रुख किया..रंगोली और चित्रहार की ओर.:)

DD से जुडी बड़ी सारी बातें हैं जो याद हैं, और किताब में बड़े ही रोचक तरीके से ८० और ९० के दशक में सर्वव्यापी prcatices का विवरण किया है...:)...फिर वो चाहे दूरदर्शन हो, या advent of internet या बॉलीवुड का असर.....Greatbong ने लोहा और गुंडा फिमों का भी अनोखा विवरण किया है..:)...दोनों ही फिल्मों पर इतनी गूढ़ दृष्टि डालने के लिए उनका बहुत बहुत शुक्रिया...:)
खैर, दूरदर्शन पे १ चिटठा कुछ भी नहीं है...:).....

बहुत देर से youtube से कुछ पुराने अच्छे धारावाहिकों के title songs download करने की कोशिश कर रही हूँ ताकि वो यहाँ चेपे जा सकें और माहौल को और रूचिपूर्ण किया जा सके, पर लगातार असफलता ही हाथ लग रही है, १२:०० से ऊपर समय हो चूका है, और ये पोस्ट कल पर टालने का मन नहीं है......तो मैं ऐसे ही याद कर लेती हूँ DD 1 के कुछ पुराने serials जो मुझे विशेष प्रिय थे..:)
सुरभि.....और उसका वो "प्रभादेवी, मुंबई" वाला address...:)
दाने अनार के....एवं मुंगेरी लाल के हसीन सपने...दोनों में ही रघुवीर यादव थे....पता चला है की आजकल वो missing हैं..:O
कशिश- मालविका तिवारी और सुदेश बेरी के amazing romance की कहानी..:)
तस्वीर- ये Sun को ११ बजे के आसपास आया करता था, बड़ी मुश्किल से इसे देखने की इजाज़त मिली थी, शायद exams से कुछ दिन पहले ही शुरू हुआ था.
.तलाश- किसी उपन्यास पर आधारित, विजयेन्द्र घाटके और नीलिमा अज़ीम (अपने शहीद कपूर की मम्मी..:)) और इसका title song पुरानी फिल्म तलाश से ही था...
होनी अनहोनी- ये Thursday को आता था...अजीब पर अच्छा
Stone Boy- aha....a story about the kids of an Indian family in Mauritius, the young boy meets a stone boy (who was once a stone or something)...and the adventures that follow....i wish i could get this series from somewhere..btw the kid who played the stone boy -Ankur Jhaveri also played Arjun jr in Mahabharat,...
Flop Show,..he he..naam hi kaafi hai..:D
नीम का पेड़, हम लोग, किले का रहस्य.. रंगोली.. the Sat/ Sun movies..... one post as i said is nothing to revisit the DD memory lane...:)

Thursday, January 14

Life etcetra....

आज बड़े दिन बाद, ऐसे ही बातों बातों में....अपने इंजीनियरिंग preperation के दिन याद आ गए.....चेहरे पे मुस्कराहट आ गयी १ बड़ी से और मन एकाएक ताज़ा सा हो गया...:)... और उस समय की मनःस्थिति भी याद आ गयी....आज जब पीछे मुडके उस समय के जीवन पे नज़र डालती हूँ...तो i feel that there was something about that time that made life appear quite simple and good ...and i wonder why??...there was so much of anxiety, uncertainity.....tension... कि पता नहीं exams clear कर भी पाएंगे या नहीं..... but still....there was something about that period that makes it so memorable....i guess that is because...
ज़िन्दगी में इतना focus किसी उद्देश्य को पूरा करने का उसके बाद शायद कभी नहीं आया...... tension थी, load था, और थोडा डर भी था but साथ ही साथ काफी peace भी था. ये पता था की क्या चाहिए, और ये भी की अगर दिल से मेहनत की और अपना काम पूरा कर लिया, तो फिर चाहे सफलता मिले न मिले, मन को शान्ति रहेगी की इससे अच्छा नहीं कर सकते थे. पढाई की तरफ १ अलग ही रुझान था. 1 disciplined सा नियमित जीवन था, जो more or less entrance exam clear करने के ओर ही घूमता है. (ये बात और है की तब ये discipline/ dedication इतना appreciate नहीं किया जाता था, because it was overridden by the anxiety to pass in it.). A little more drilled attempt at thinking and i feel the main reason was that, during that phase 80% control over the things was in our own hands. Result use to be directly proportional to the amount of hardwork/ commitment you put in. Since this equation was fairly applicable to most of the situations then, so somewhere we had this hope that correct amount of hardwork and dedication would certainly lead to good results. In other words, situation ke variables are in your hands, you have to play with them to maximize the results....:)

And then when I compare life after all these entrance exams and college to my life now; i realise why it is called "real" world..:)
Everything else is same, the hard work, sincerity, commitment, will to succeed....the only thing which has changed is...the equation...which has now become an in-equation...:)....the control of all the variables in this real world is no more in our hands solely. There are external factors which are totally outside our control, which determine the result of our actions- more or less depending on the situation....
And this situation might be anything.....your promotion in this current job, your fight to get a new one, a hearbtreak...anything for that matter...:)
Thats why, life in those student days seems so simple and joyful now...:))
An arguement against this can be, that as we grow, as our horizons expand, everytime we might not be the best judge of what is right for us, hence eventually, all the internal/ external variables work together, to result in what is best "for us" in that situation.
But then, when a part of such situations in life, its not very easy to understand the above theory...:)...

Anyways, hope the best happens to each one of us...and we all soon learn to live with these in-equations...:)
And my engg prep days remind me of my organic chem teacher, sardaarji we use to call him; a super gentle person, who had the habit of using plural for everything. १ बार उन्होंने १ student को बोला....."आप कल अपने "fathers" को बुला के लाइये".... होनहार बालक बोला...." sir कौनसे ??..सिविल lines वाले या neeti nagar वाले" ...:D
ये post लिखते हुए कोई गाना नहीं सुना...फिर भी ये गीत चिपकाने का मन है यहाँ....:)

Wednesday, December 16

फुर्सत

आज ऑफिस में १ कांफेरेंस कॉल थी, शाम ७:३० बजे पूरी तैय्यारी के साथ कॉल का वेट किया, लॉग इन भी किया, लेकिन सामने वाली पार्टी को यू एस ऑफ़ ए में किसी अनियोजित कार्य ने घेर लिया शायद और कॉल कैंसल...:) १ दम ऐसे लगा जैसे की बचपन में बारिश वाले दिन पानी से भरी सड़कों से जूझते हुए स्कूल गए हों...और "Rainy day" घोषित हो गया हो....:)...अलौकिक आनंद की अनुभूति....:)
इसी ख़ुशी के अवसर पे ये मधुर गीत.....

वैसे इस "जैसे" के बाद कई उपमाएं लग सकती हैं.....
-जैसे ....इंजीनियरिंग में सेमेस्टर रिजल्ट आने की खबर, अफवाह साबित हो गयी हो....:D
-जैसे....CAT का इम्तिहान जो अभी अभी आप बर्बाद करके घर आये हैं वो रद्द हो गया हो....:)
-जैसे....सुबह आधा घंटा पहले आँख खुल जाए...और फिर मन प्रफुल्लित हो उठे की वाह! थोडा और सो सकते हैं....:)
-जैसे ...आपको printouts के लिए pages चाहिए हों रात के २ बजे, और कोई भला मानुस अपने A4 शीट्स लैब में ही भूल गया हो...:)
जैसे ...न जाने क्या क्या.....:)

१ मित्र ने आज अपनी पहली नौकरी से इस्तीफ़ा दिया...और उन्होंने इस "resigning" अनुभव का विवरण कुछ इस प्रकार किया ...."ऐसा लग रहा है जैसे कि किसी giant wheel में बैठ के नीचे आते समय लगता है."...:)....नई नौकरी कि आपको ढेरों बधाइयाँ... !!
खैर....ऐसा thrilling अनुभव हमें भी जल्द ही हो ...तब तक हम ऐसे "call cancel" types अनुभवों में ही खुश रहते हैं...:)